बुझड़ा सिखवाल ब्राह्मण समाज द्वारा चारभुजा तक 24वीं पैदल यात्रा, जय चारभुजानाथ के जयकारों से गूंजा मार्ग।

राजसमंद। सिखवाल ब्राह्मण समाज के गांव बुझड़ा, पोस्ट कुंदवा, तहसील देवगढ़, जिला राजसमंद से आराध्य देव भगवान चारभुजानाथ के धाम गढ़बोर तक इस वर्ष भी श्रद्धा और आस्था की पैदल यात्रा निकाली गई। यह यात्रा लगातार 24वें वर्ष आयोजित हुई। हर वर्ष की तरह इस बार भी यात्रा में गांव के बच्चे, युवा, महिलाएं और पुरुष बड़ी संख्या में शामिल हुए और भक्तिभाव के साथ चारभुजानाथ के दर्शन के लिए पैदल रवाना हुए।यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। हाथों में ध्वज, मुख पर भगवान चारभुजानाथ का नाम और रास्तेभर गूंजते जयकारों ने धार्मिक वातावरण बना दिया। समाज के लोगों के लिए यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, सामाजिक एकता और सनातन परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है। 24 वर्षों से निभ रही आस्था की परंपरा,बुझड़ा गांव से चारभुजा गढ़बोर तक पैदल यात्रा प्राचीन समय में कुछ लोग ही यात्रा में जाते थे लेकिन अब यूवा ने की ऐतिहासिक इसकी शुरुआत 24 वर्ष पहले हुई थी। इसके बाद प्रत्येक वर्ष श्रद्धालु सामूहिक रूप से भगवान चारभुजानाथ के दर्शन के लिए यात्रा करते आ रहे हैं। समय के साथ इस यात्रा में बच्चों और युवाओं की भागीदारी भी बढ़ी है।परिवारों के साथ यात्रा में शामिल होने से बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक धार्मिक परंपरा का जुड़ाव बना हुआ है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु भगवान चारभुजानाथ से परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।गढ़बोर के चारभुजानाथ धाम का ऐतिहासिक महत्वराजसमंद जिले के गढ़बोर में स्थित श्री चारभुजानाथ मंदिर राजस्थान के प्रमुख प्राचीन वैष्णव तीर्थों में माना जाता है। राजस्थान सरकार की सूची में भी श्री चारभुजा जी मंदिर, ग्राम गढ़बोर, राजसमंद को मंदिर के रूप में दर्ज किया गया है।मंदिर भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप को समर्पित है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में भगवान चारभुजानाथ को श्रीकृष्ण के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। मंदिर के इतिहास को लेकर विभिन्न धार्मिक कथाएं और स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं।ऐतिहासिक संदर्भों में मंदिर से जुड़े 1444 ईस्वी के शिलालेख का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार बाद के समय में मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया गया। इसी कारण गढ़बोर का चारभुजा धाम मेवाड़ क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।पांडवों से जुड़ी धार्मिक मान्यताचारभुजानाथ मंदिर को लेकर एक प्राचीन धार्मिक मान्यता पांडवों से भी जुड़ी है। मान्यता के अनुसार पांडवों ने अपने वनवास और हिमालय की ओर अंतिम यात्रा से पहले भगवान की इस प्रतिमा के दर्शन किए थे। बाद के समय में प्रतिमा की सुरक्षा के लिए उसे जल में सुरक्षित रखने की कथा भी स्थानीय परंपरा में मिलती है।इन कथाओं को मंदिर की धार्मिक एवं लोक-परंपरागत मान्यताओं के रूप में देखा जाता है। इनके सभी ऐतिहासिक विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में समान रूप से नहीं मिलती।मंदिर की रक्षा के लिए 125 युद्धों की मान्यतागढ़बोर के चारभुजानाथ मंदिर के संबंध में एक प्रसिद्ध स्थानीय मान्यता यह भी है कि मंदिर और भगवान के विग्रह की रक्षा के लिए 125 युद्ध लड़े गए। आक्रमणों और संकट के दौर में भगवान की प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए उसे जल में छिपाने की परंपरा की कथा भी प्रचलित है।स्थानीय धार्मिक इतिहास में यह प्रसंग चारभुजानाथ के प्रति श्रद्धा और विग्रह की रक्षा के लिए किए गए प्रयासों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि 125 युद्धों की संख्या को प्रमाणित करने वाला विस्तृत स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे स्थानीय मान्यता के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।अनूठी है चारभुजानाथ की सेवा-पूजा परंपराचारभुजानाथ मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में यहां की सेवा-पूजा व्यवस्था का उल्लेख किया जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा करीब 1000 गुर्जर परिवारों से जुड़ी हुई है। इन परिवारों में सेवा का अवसर बारी यानी ‘ओसरा’ व्यवस्था के अनुसार आता है। कुछ परिवारों को अपेक्षाकृत कम अंतराल में तो कुछ को कई दशकों बाद सेवा का अवसर मिलने की बात कही जाती है।यही व्यवस्था चारभुजानाथ मंदिर को अन्य प्रमुख वैष्णव मंदिरों से अलग पहचान देती है। यहां सेवा-पूजा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और जिम्मेदारी के रूप में देखी जाती है।जलझूलनी एकादशी पर लगता है विशाल मेलाचारभुजानाथ मंदिर में भाद्रपद शुक्ल एकादशी यानी जलझूलनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गढ़बोर पहुंचते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान की चल प्रतिमा को विशेष शोभायात्रा के साथ जलाशय तक ले जाया जाता है और स्नान के बाद विशेष श्रृंगार किया जाता है।इसके अलावा जन्माष्टमी, रामनवमी, नवरात्र सहित विभिन्न धार्मिक पर्वों पर भी मंदिर में विशेष आयोजन और पूजा-अर्चना होती है।आस्था और सामाजिक एकता का संदेशबुझड़ा से चारभुजा तक निकली 24वीं पैदल यात्रा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक यात्राएं केवल दर्शन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी बनती हैं। बच्चों और युवाओं की भागीदारी से यह परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंच रही है, वहीं महिलाओं और बुजुर्गों की सहभागिता यात्रा को सामूहिक आस्था का स्वरूप देती है।बुझड़ा से गढ़बोर तक श्रद्धा के कदम बढ़ाते श्रद्धालुओं के लिए यह 24वीं पैदल यात्रा भगवान चारभुजानाथ के प्रति समर्पण, सामाजिक एकजुटता और वर्षों पुरानी धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रतीक बनी।

जय श्री चारभुजानाथ। जय श्रीकृष्ण।

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