RSS सेवा और समर्पण स्वर्गीय लक्ष्मीचंद अग्रवाल : आजीवन साधना, सेवा और समर्पण का प्रेरक जीवनकुछ व्यक्तित्व केवल अपना जीवन नहीं जीते, वे अपने जीवन को एक आदर्श बनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते

स्वर्गीय लक्ष्मीचंद अग्रवाल : आजीवन साधना, सेवा और समर्पण का प्रेरक जीवनकुछ व्यक्तित्व केवल अपना जीवन नहीं जीते, वे अपने जीवन को एक आदर्श बनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते तथा राष्ट्रीय दायित्वों से कभी विमुख नहीं हुए। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने परिवार, समाज और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा।उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी अद्भुत संघनिष्ठा। मात्र 12 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जुड़े और फिर जीवन के अंतिम क्षणों तक यह साधना निरंतर चलती रही। लगभग 82 वर्षों की संघ-यात्रा में उन्होंने शाखा, खंड, नगर और विभाग स्तर पर अनेक दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। पद चाहे कोई भी रहा हो, उनकी पहचान सदैव एक समर्पित “स्वयंसेवक” की रही।94 वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह युवाओं के लिए प्रेरणा था। अंतिम दिनों तक शाखा जाना, प्रार्थना में सहभागी होना और संघकार्य के प्रति समर्पित रहना उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। जब उन्हें अनुभव हुआ कि जीवन-यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच रही है, तब भी उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के, पूर्ण शांति और संतोष के साथ इस संसार से विदा ली।उनका विश्वास अटूट था कि राष्ट्रकार्य ईश्वरीय कार्य है और इसे जीवन भर करते रहना ही सच्ची साधना है। उनका जीवन-मंत्र मानो यही था—”साधना के देश में,मत नाम ले विश्राम का।”संगठन के प्रति उनकी निष्ठा का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग वर्ष 1962 का है। नागपुर में पूज्य डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर के उद्घाटन अवसर पर वे अपनी धर्मपत्नी और छोटे पुत्र के साथ उपस्थित थे। परिक्रमा के दौरान पूज्य श्रीगुरुजी ने उनके पुत्र को अपनी गोद में लेकर उन्हें परिक्रमा पूरी करने का अवसर दिया। यह संस्मरण उनके परिवार के लिए आजीवन प्रेरणा और गौरव का विषय बना रहा।संघ कार्य के अतिरिक्त लक्ष्मीचंद जी अनेक सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे। मालवीय विद्या मंदिर विद्यालय में उन्होंने वर्षों तक कोषाध्यक्ष के रूप में अत्यंत ईमानदारी, निष्ठा और निष्काम भाव से सेवाएँ प्रदान कीं। उनके व्यक्तित्व में संगठनात्मक दक्षता, सरलता, विनम्रता और आत्मीयता का अद्भुत समन्वय था।आज जब हम उनके जीवन को देखते हैं तो समझ में आता है कि किसी भी महान संगठन की नींव ऐसे ही मौन तपस्वियों के त्याग और साधना पर खड़ी होती है। उन्होंने प्रसिद्धि की अपेक्षा नहीं की, सम्मान की आकांक्षा नहीं रखी, बल्कि अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित कर दिया।ऐसे कर्मयोगी, तपस्वी स्वयंसेवक, समाजसेवी और प्रेरणापुंज व्यक्तित्व को शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।”तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित”— यह पंक्ति उनके जीवन का सजीव परिचय थी।

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