राजनांदगांव, 18 अगस्त। परम पूज्य खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. एवं खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागरजी के सुशिष्य मुनि श्री समयप्रभ सागरजी ने कहा कि जीवन में विपरीत परिस्थितियां आने पर भी व्यक्ति को सकारात्मक सोच बनाए रखनी चाहिए। नकारात्मक विचार मन में जल्दी आते हैं, लेकिन सकारात्मक सोच ही व्यक्ति को अपने ध्येय और मोक्ष के मार्ग की ओर आगे बढ़ाती है।मुनि श्री समयप्रभ सागरजी मंगलवार को ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में आयोजित नियमित प्रवचन में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन में एक बार वैराग्य की भावना जागृत हो जाए तो व्यक्ति के भीतर आत्म-जागृति का मार्ग प्रशस्त होता है। कर्मों की निर्जरा के लिए सच्चे मन से अनुमोदना करना सीखना आवश्यक है। जब व्यक्ति इसे हृदय से आत्मसात करता है, तभी उसे वास्तविक अनुभूति होती है और वह अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ पाता है।जो जीवन में जरूरी है, उसे कभी न छोड़ें : श्रेयांशप्रभ सागरधर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागरजी ने कहा कि जो हमारे जीवन में वास्तव में जरूरी है, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही सच्चे प्रेम की पहचान है। उन्होंने कहा कि प्रेम एक ऐसा भाव है, जिसका कोई निश्चित कारण या सीमा नहीं होती। किसी से प्रेम हो जाने के बाद परिस्थितियां बदलने पर भी उस प्रेम को छोड़ा नहीं जाता।उन्होंने कहा कि सच्चा प्रेम वह है, जिसमें सामने वाला साथ छोड़ दे, फिर भी व्यक्ति उसके प्रति अपने भाव नहीं छोड़ता। समय के साथ बहुत कुछ बदल सकता है, लेकिन सच्चा प्रेम नहीं बदलता।मुनि श्री ने नकारात्मक सोच से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति नकारात्मक विचारों के कारण कई बार तथ्यों को सही ढंग से समझ और अनुभव नहीं कर पाता। इसलिए जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना जरूरी है।उन्होंने कहा कि जिन्होंने हमें जीवन दिया, संस्कार दिए और जीवन जीने की दिशा दिखाई, उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। मकान बनाते समय हम सबसे पहले अपने कमरे की चिंता करते हैं, जबकि जीवन में परमात्मा के लिए स्थान और पूजा कक्ष के निर्माण की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। हमें अपने जीवन में परमात्मा को कभी नहीं भूलना चाहिए।यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।
विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोच रखें : कहा जैन मुनि समयप्रभ सागर जी ने।












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