गैस के बाद अब पेट्रोल-डीजल पर बवाल क्यों?कुछ सप्ताह पहले देश के कई हिस्सों में घरेलू गैस को लेकर ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो अगले ही दिन से चूल्हे बुझ जाए

गैस के बाद अब पेट्रोल-डीजल पर बवाल क्यों?कुछ सप्ताह पहले देश के कई हिस्सों में घरेलू गैस को लेकर ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो अगले ही दिन से चूल्हे बुझ जाएंगे।
1500-2000 रुपये में मिलने वाला इंडक्शन चूल्हा 5000-6000 रुपये तक बेचा जाने लगा।

लोग सिलेंडर जमा करने लगे, सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाज़ार गर्म हो गया, घर-घर में एक ही चर्चा — “गैस खत्म हो जाएगी।”
लेकिन हुआ क्या?
ना गैस की कोई बड़ी किल्लत हुई, ना देश रुका, ना लोगों के घरों में खाना बनना बंद हुआ।

कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो गया, पर उस दौरान डर, अफवाह और कृत्रिम घबराहट ने बाजार और आम लोगों दोनों को परेशान जरूर किया।
आज वही दृश्य पेट्रोल-डीजल को लेकर दिखाई दे रहा है।

पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें…
जिसकी जितनी क्षमता, वह उतना पेट्रोल भरवा रहा है…
कोई गैलन में स्टोर कर रहा है, कोई डिब्बों में जमा कर रहा है…
ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो कल सुबह से देश में एक बूंद पेट्रोल नहीं मिलेगा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस डर को हवा देने में सोशल मीडिया, अफवाहें और लोगों की मनोवैज्ञानिक बेचैनी सबसे बड़ी भूमिका निभा रही है। एक व्यक्ति लाइन में लगता है, दूसरा उसे देखकर डर जाता है, तीसरा वीडियो बनाकर वायरल कर देता है, और देखते ही देखते “जरूरत” से ज्यादा “घबराहट” पैदा हो जाती है।

स्थिति यह हो गई है कि घरों में महिलाएं भी दबाव बनाने लगी हैं —
“जाकर गाड़ी फुल करा लो, पता नहीं आगे क्या हो जाए!” अब सवाल यह है कि अगर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों या खाड़ी देशों में तनाव के कारण वास्तव में कोई समस्या आती भी है, तो क्या कुछ लीटर पेट्रोल जमा कर लेने से कोई महीनों तक बच जाएगा?
अगर संकट बड़ा होगा तो उसका असर पूरे देश और पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

ऐसे समय में संयम, धैर्य और जिम्मेदारी की जरूरत होती है, न कि अफवाह और अंधाधुंध जमाखोरी की।असल समस्या कमी से ज्यादा “कमी का डर” है।जब लोग आवश्यकता से अधिक खरीदने लगते हैं, तभी कृत्रिम संकट पैदा होता है।यही कारण है कि कई बार बाजार में वस्तुएं उपलब्ध होने के बावजूद लंबी लाइनें और तनाव दिखाई देने लगता है।

हमें यह समझना होगा कि देश अफवाहों से नहीं, व्यवस्था और धैर्य से चलता है।हर परिस्थिति में सरकार, तेल कंपनियां और सप्लाई सिस्टम लगातार काम करते रहते हैं।
आलोचना करना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन हर अफवाह को राष्ट्रीय संकट बना देना समझदारी नहीं।

जरूरत सिर्फ इतनी है कि —
जितनी आवश्यकता हो उतना ही लें
अफवाहों पर नहीं, आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें
डर फैलाने वालों से सावधान रहें
और समाज में घबराहट नहीं, संयम का वातावरण बनाएं।
क्योंकि कई बार भय व संकट अफवाहों के कारण ही पैदा होती है

( मनोज शुक्ला )

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *