,11 मई 2026
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित “ज्ञानभारतम” (राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान) के तहत छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। यहाँ इतिहास, धर्म और साहित्य के संगम वाली रामचरितमानस की एक अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपि प्राप्त हुई है। विशेषज्ञों ने इस प्राचीन से अमूल्य बताया है।*चार पीढ़ियों का समर्पण- धनौली के उपाध्याय परिवार की विरासत* यह पांडुलिपि गौरेला विकासखंड के ग्राम पंचायत धनौली निवासी श्री ज्ञानेंद्र उपाध्याय के परिवार के पास सुरक्षित थी। परिवार के अनुसार, उनके परदादा ने दशकों पहले इस ग्रंथ की महत्ता को समझते हुए इसे सहेजना शुरू किया था। तब से लेकर आज तक, चार पीढ़ियों ने इस अमूल्य निधि को दीमक और समय की मार से बचाकर रखा। अब ज्ञानभारतम अभियान के माध्यम से इसे वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकृत और डिजिटल रूप से सुरक्षित कर लिया गया है।*कलेक्टर की मौजूदगी में हुआ डिजिटल संरक्षण* पांडुलिपि के संरक्षण कार्य के दौरान कलेक्टर डॉ. संतोष कुमार देवांगन स्वयं उपस्थित रहे। उन्होंने इस अवसर पर कहा ये पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा का जीवंत इतिहास हैं। इनका संरक्षण हमारी आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध विरासत से जोड़ने का एक सेतु है।*क्यों खास है यह पांडुलिपि?* विशेषज्ञों के अनुसार, अवधी भाषा में रचित यह पांडुलिपि कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह उस काल की लेखन शैली और भाषाई संरचना को समझने का बड़ा स्रोत है। इसके अध्ययन के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। यह क्षेत्र की प्राचीन ज्ञान परंपरा और शिक्षा के प्रसार का जीवंत एवं ऐतिहासिक प्रमाण है।*क्या है “ज्ञानभारतम” अभियान?* कलेक्टर गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही डॉ. देवांगन ने बताया कि इस राष्ट्रीय अभियान का मुख्य उद्देश्य निजी संग्रहों, मंदिरों, आश्रमों और पुराने संस्थानों में बिखरी हुई प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान करना है। इन धरोहरों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और डिजिटल संरक्षण किया जा रहा है ताकि भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा को हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सके। गौरेला- पेन्ड्रा-मरवाही जिले में इस दुर्लभ ग्रंथ का मिलना न केवल जिले के लिए, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। ज्ञानभारतम अभियान के तहत राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसी दुर्लभ कड़ियों की खोज निरंतर जारी है।













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