आज शादी ब्याह या कोई भी सामाजिक कार्य हो उसमें कपड़ों का लेन-देन चलता है क्या गरीब हो अमीर सभी इस परंपरा को निभाते है हम इसे पैरावनी, सिख आदि के नाम से भी जाने ते पुकारते है, समय के साथ-साथ फैशन का दौर भी बदल चुका है हम जो कपड़ों का लेनदेन करते हैं वह अधिकांश घरों में ऐसा ही पड़ा रहता है या फिर कोई प्रोग्राम होता तो उसको वहां लेनदेन करते है इस परंपरा को धीरे-धीरे समाप्त करते हुए अपनी श्रद्धा अनुसार 100, 500, 1100, जो भी हो देने लेने , पैरावनी या सिख में चालू कर देना चाहिये जिसके कई फायद है इस पर विचार जरूर करना चाहिए हमारे एक सर्व के अनुसार समाज परिवार के लोगों का कहना है
।कपडे।बिल्कूल।बन्द।होने।चाहिए नव।रोकड।तैरा।ऊधार।भले।ही।दस।दसरुपये।ही।सरदा।अनुसार।ही।देवे।सापर न्तु।कपडे।बिलकुल।ही।बन्द।होने।चाहिए। सा।सभी।समाज।भा,ई।बन्धू।इस।पर।अवशय।विचारकरे।समाज कन्हैंयालाल उपाध्याय जी ने भी सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी है।ओर हम सभी का मानना बिल्कुल सही है।
लखन शर्मा सिखवाल व्यास














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