21 वर्षों से बोल बम शिविर में सेवा की मिसाल, ट्रक चालक पिता-पुत्र एक माह तक काम धंधा बंद कर करते हैं कांवरियों की सेवा,भैयाथान के विक्रम और अधिराज पिछले 10 वर्षों से सरगुजा-कोरिया बोल बम समिति के शिविर में दे रहे निस्वार्थ सेवाएं।

21 वर्षों से बोल बम शिविर में सेवा की मिसाल, ट्रक चालक पिता-पुत्र एक माह तक करते हैं कांवरियों की सेवाभैयाथान के विक्रम और अधिराज पिछले 10 वर्षों से सरगुजा-कोरिया बोल बम समिति के शिविर में दे रहे निस्वार्थ सेवाएं सावन के पवित्र महीने में बाबा वैद्यनाथ धाम की यात्रा पर निकलने वाले कांवरियों के लिए रास्ते में विश्राम और भोजन की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी सेवा भावना को लेकर छत्तीसगढ़ के समाजसेवियों द्वारा गठित सरगुजा-कोरिया बोल बम समिति पिछले करीब 21 वर्षों से कांवरियों की सेवा के लिए शिविर लगा रही है।इसी सेवा परंपरा की एक प्रेरणादायक मिसाल भैयाथान के समाजसेवी विक्रम और उनके पुत्र अधिराज हैं। परिवार की आय का मुख्य साधन एकमात्र ट्रक है, लेकिन इसके बावजूद पिता-पुत्र पिछले करीब 10 वर्षों से अपना ट्रक लेकर एक माह के लिए शिविर में पहुंचते हैं। ट्रक में महीनेभर की आवश्यक सामग्री लेकर वे न केवल शिविर के संसाधनों में सहयोग करते हैं, बल्कि पूरे एक महीने तक कांवरियों की सेवा में जुटे रहते हैं।बाबा वैद्यनाथ धाम में देशभर से श्रद्धालु करीब 110 किलोमीटर की कांवर यात्रा कर जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान यात्रियों के लिए भोजन और विश्राम की आवश्यकता को देखते हुए सरगुजा-कोरिया बोल बम समिति का शिविर उनके लिए बड़ा सहारा बनता है।शिविर के भोजन की कांवरियों में खास पहचाननियमित कांवर यात्री इस शिविर में मिलने वाले भोजन की खूब तारीफ करते हैं। श्रद्धालु यहां के भोजन को पसंद करते हैं और सेवा भाव की सराहना करते नहीं थकते। विक्रम और अधिराज जैसे सेवाभावी लोग पर्दे के पीछे रहकर पूरे समर्पण के साथ कांवरियों की सेवा में लगे रहते हैं।समिति को उसकी सेवा गतिविधियों के लिए बिहार सरकार द्वारा प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया जा चुका है।सनातन परंपरा केवल किसी संस्था, संगठन या राजनीतिक दल के सहारे नहीं चलती, बल्कि इसके पीछे पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कार, सेवा, दान और धार्मिक परंपराएं हैं। धर्म रक्षा और समाज सेवा के लिए अर्थदान, वस्तुदान और श्रमदान की परंपरा भारतीय समाज में सदियों से रही है।विक्रम और अधिराज की सेवा इसी सनातनी परंपरा की जीवंत मिसाल है। परिवार की सीमित आय के बावजूद एक महीने तक अपना समय, संसाधन और श्रम कांवरियों की सेवा में समर्पित करना निश्चित रूप से समाज के लिए प्रेरणादायक है।ऐसे ही अनगिनत परिवारों और सेवाभावी लोगों की निस्वार्थ भावना से धार्मिक परंपराएं आज भी जीवित हैं।सत्य सनातन धर्म की जय।हर हर महादेव।

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