दिल्ली का होटल बना श्मशान,21 लोगो की जान गईं ,रायपुर कब जागेगा? दिल्ली के मालवीय नगर में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया।

दिल्ली का होटल बना श्मशान, रायपुर कब जागेगा? दिल्ली के मालवीय नगर में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर हम विकास कर रहे हैं या विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं? होटल में लगी आग की इस भयावह घटना में अनेक विदेशी नागरिकों सहित 21 लोगों की जान चली गई, अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कई परिवारों की खुशियां पल भर में राख हो गईं। यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था, निगरानी और लापरवाही पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।लेकिन असली सवाल दिल्ली नहीं है।असली सवाल यह है कि यदि भगवान ना करें पर कभी ऐसी कोई घटना रायपुर में हो जाए तो क्या होगा?रायपुर तेजी से बढ़ रहा है। नई कॉलोनियां बस रही हैं, गली गली , बहुमंजिला भवन खड़े हो रहे हैं, होटल, लॉज, पीजी और हॉस्टल खुल रहे हैं। लेकिन क्या इनके साथ सुरक्षा मानकों का पालन भी उतनी ही तेजी से हो रहा है?शहर की दर्जनों बस्तियों और पुराने मोहल्लों में ऐसी संकरी गलियां हैं जहां दोपहिया वाहन मुश्किल से निकलते हैं। कई जगहों पर तो ऑटो तक नहीं पहुंच पाती। इन्हीं गलियों में तीन-तीन, चार-चार और पांच-पांच मंजिला इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। कई भवनों में दर्जनों लोग रहते हैं, कहीं होटल चल रहे हैं तो कहीं छात्रावास।सवाल यह है कि यदि आधी रात को वहां आग लग जाए तो क्या फायर ब्रिगेड पहुंच पाएगी?क्या एंबुलेंस उन गलियों में प्रवेश कर पाएगी?क्या भवनों में आपातकालीन निकास द्वार हैं?क्या अग्निशमन यंत्र काम कर रहे हैं?क्या विद्युत वायरिंग का नियमित निरीक्षण होता है?या फिर सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है?वास्तविकता यह है कि भवन निर्माण की अनुमति लेने के बाद अधिकांश लोग सुरक्षा नियमों को बोझ समझने लगते हैं। कई जगह पार्किंग को कमरों में बदल दिया गया है, खुली जगहों पर अवैध निर्माण कर दिए गए हैं, छतों तक पहुंचने के रास्ते बंद कर दिए गए हैं और अग्निशमन उपकरण केवल कागजों में मौजूद हैं।दुर्भाग्य यह है कि जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक न प्रशासन जागता है, न जनप्रतिनिधि और न ही समाज। हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं, नोटिस जारी होते हैं, कार्रवाई की घोषणाएं होती हैं और कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है।दिल्ली की घटना रायपुर के लिए चेतावनी है।यह समय दोषारोपण का नहीं, आत्ममंथन का है। नगर निगम, फायर विभाग, राजस्व प्रशासन, पुलिस और सरकार को मिलकर शहर के होटलों, हॉस्टलों, पीजी और बहुमंजिला भवनों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। जहां नियमों का उल्लंघन हो रहा है वहां सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, आवश्यकता है।याद रखिए, आग लगने के बाद फायर ब्रिगेड की गाड़ी बुलाना समाधान नहीं होता। समाधान है कि ऐसी परिस्थितियां ही पैदा न होने दी जाएं।दिल्ली का एक होटल श्मशान बन गया। वहां की चीखें और राख में बदल चुके सपने हमें चेतावनी दे रहे हैं।प्रश्न यह है कि क्या रायपुर इस चेतावनी को सुनेगा, या किसी बड़े हादसे का इंतजार करेगा?क्योंकि दुर्घटनाएं बताकर नहीं आतीं, लेकिन लापरवाही हमेशा उनके आने का रास्ता तैयार करती

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