ग्वालियर/4सितंबर 2026
जन्माष्टमी पर ग्वालियर के प्रभु का राजसी श्रृंगार, 120 करोड़ के बेशकीमती जेवरों से सजे भगवानसिंधिया राजघराने के दुर्लभ रत्नजड़ित आभूषणों से हुआ भगवान का श्रृंगार, सात लड़ियों वाले ऐतिहासिक हार में जड़े हैं 62 असली मोती और 55 दुर्लभ पन्नेग्वालियर। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर ग्वालियर में भगवान का अनोखा और भव्य राजसी श्रृंगार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। साल में केवल एक बार जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान को सिंधिया राजघराने के बेशकीमती और दुर्लभ रत्नजड़ित आभूषणों से सजाया जाता है। इस विशेष श्रृंगार में इस्तेमाल होने वाले जेवरातों की कुल अनुमानित कीमत करीब 120 करोड़ रुपये बताई जा रही है।भगवान के इस राजसी श्रृंगार को देखने के लिए श्रद्धालुओं में खासा उत्साह रहता है। जन्माष्टमी के दिन भगवान का स्वरूप राजसी वैभव और आध्यात्मिक आस्था का अद्भुत संगम नजर आता है।35 करोड़ का ऐतिहासिक सात लड़ियों वाला हारइस श्रृंगार का सबसे बड़ा आकर्षण सात लड़ियों वाला ऐतिहासिक हार है। बताया जाता है कि इस बेशकीमती हार में 62 असली मोती और 55 दुर्लभ पन्ने जड़े हुए हैं। इसकी अनुमानित कीमत करीब 35 करोड़ रुपये बताई जाती है।हार की दुर्लभता और ऐतिहासिक महत्व इसे भगवान के श्रृंगार में सबसे खास आभूषणों में शामिल करता है।25 करोड़ का रत्नजड़ित मुकुट भी खासभगवान के श्रृंगार में करीब 25 करोड़ रुपये का रत्नजड़ित मुकुट भी शामिल है। इसके अलावा लगभग 1.25 करोड़ रुपये का सोने का मुकुट, राधारानी का करीब तीन तोले का मुकुट तथा पुखराज और माणिक्य जैसे कीमती रत्नों से जड़े अन्य आभूषण भी भगवान को धारण कराए जाते हैं।इन दुर्लभ आभूषणों के कारण जन्माष्टमी पर भगवान का स्वरूप देखते ही बनता है। श्रद्धालु इस दिव्य और राजसी रूप के दर्शन को अपने लिए सौभाग्य मानते हैं।लक्ष्मीपति के लिए धन-दौलत का क्या महत्व…भगवान श्रीकृष्ण के इस राजसी श्रृंगार के पीछे सिर्फ वैभव का प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति की भावना भी जुड़ी हुई है। आखिर वे लक्ष्मीपति हैं, जिनके इशारे पर सृष्टि का भाग्य तय होता है।मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा की गरीबी को भी क्षणभर में समृद्धि में बदल दिया था। इसलिए भक्तों की नजर में भगवान के लिए करोड़ों के आभूषण और गरीब भक्त की छोटी-सी भेंट—दोनों का महत्व श्रद्धा में है।कोई भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार सवा रुपया अर्पित करता है तो कोई करोड़ों की सेवा करता है। भगवान के लिए मूल्य से अधिक मायने भक्त के मन में छिपी भावना और श्रद्धा का है।गरीब की कुटिया में भी उतने ही प्रसन्न, राजसी श्रृंगार में भीभक्तों का मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण गरीब के घर में प्रेम से चढ़ाए गए छोटे से प्रसाद से भी उतने ही प्रसन्न होते हैं, जितने करोड़ों के रत्नजड़ित आभूषणों से किए गए राजसी श्रृंगार से।जन्माष्टमी का यह अनोखा श्रृंगार यही संदेश देता है कि भक्ति की कोई कीमत नहीं होती। किसी के पास सवा रुपया है तो वही उसकी सबसे बड़ी भेंट है और किसी के पास सवा सौ करोड़ की संपत्ति—वह भी भगवान की ही देन मानी जाती है।इसी आस्था और श्रद्धा के साथ जन्माष्टमी पर ग्वालियर में भगवान का यह दिव्य राजसी स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बना हुआ है।















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