अमरावती में गुरु पूर्णिमा महोत्सव भव्यता के साथ संपन्न, श्री श्रृंगी ऋषि तपोभूमि पर हुआ पूजन-अर्चन।

अमरावती /30 जुलाई 2026

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अमरावती स्थित श्री क्षेत्र तपोवनेश्वर में विराजमान श्री श्रृंगी ऋषि जी की तपोभूमि पर श्रद्धा, आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। मान्यता है कि महर्षि श्रृंगी ऋषि ने इस पवित्र स्थल पर वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिसका उल्लेख यहां स्थापित शिलालेख पर भी अंकित है। इस अवसर पर गुरुदेव के चित्र का विधिवत पूजन-अर्चन, माल्यार्पण एवं वंदन किया गया।अमरावती सिखवाल ब्राह्मण समाज द्वारा आयोजित गुरु पूर्णिमा उत्सव-2026 अत्यंत भव्य, शानदार एवं ऐतिहासिक रूप से संपन्न हुआ। कार्यक्रम में समाज के सभी वर्गों की उत्साहपूर्ण सहभागिता रही। नवगठित सिखवाल पंचायत संस्था, अमरावती की कार्यकारिणी ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्था के अध्यक्ष रामेश्वर देविलाल उपाध्याय, उपाध्यक्ष रामगोपाल नारायण कोलरिया, संगठन प्रमुख सुरेश शेषमल पांडे, सचिव श्यामसुंदर बाबूलाल उपाध्याय, कोषाध्यक्ष विजय भैरूलाल ओझा, भवन व्यवस्थापक ओमप्रकाश रामचंद्र कोलरिया एवं सदस्य अजयकुमार सरदारमल कोलरिया सहित सभी पदाधिकारियों ने आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय योगदान दिया।कार्यक्रम में श्री श्रृंगी ऋषि प्रगति मंडल, महिला मंडल की नवगठित कार्यकारिणी, समाज की मातृशक्ति, युवतियों एवं समाज के सभी बंधुओं का उल्लेखनीय सहयोग रहा। इस अवसर पर महिला मंडल की नवगठित कार्यकारिणी का सम्मान भी किया गया।गुरु पूर्णिमा महोत्सव के लाभार्थी नरेश शंकर व्यास, गोविंद व्यास, जगदीश व्यास, कैलाश व्यास एवं व्यास परिवार के सदस्यों का सिखवाल पंचायत संस्था द्वारा शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया गया। साथ ही समाज के मेधावी छात्र-छात्राओं को भी सम्मानित कर उनकी प्रतिभा का उत्साहवर्धन किया गया।महोत्सव के अंतर्गत निकाली गई गुरु पूर्णिमा शोभायात्रा भी आकर्षण का केंद्र रही। शोभायात्रा के दौरान समाज के वरिष्ठजनों के निवास पर पहुंचकर उनका शॉल, श्रीफल एवं प्रसाद देकर सम्मान किया गया। सम्मानित वरिष्ठजनों में गोविंदराम कोलरिया, बाबूलाल पांडे, श्याम नागला, विष्णुप्रसाद उपाध्याय, शंकरलाल उपाध्याय, मिश्रीलाल व्यास, पुखराज व्यास एवं रामचंद्र पांडे शामिल रहे।पूरे आयोजन में गुरु भक्ति, सामाजिक एकता, परंपरा और संस्कारों का अनुपम संगम देखने को मिला। समाजजनों ने इसे गुरु परंपरा के संरक्षण और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने वाला ऐतिहासिक आयोजन बताया।

नंदकिशोर रामचंद्र शर्मा,
अमरावती

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