श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि संघौर: आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम
बाबैन (कुरुक्षेत्र)। भारत प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों की कर्मस्थली और तपोभूमि के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है। यही कारण है कि यहां धर्म, संस्कृति और आस्था की गहरी जड़ें हैं। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के बाबैन खंड का गांव संघौर भी ऐसी ही एक पवित्र भूमि है, जिसे महर्षि श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है। लगभग चार हजार की आबादी और करीब 2,500 मतदाताओं वाला यह गांव आज भी अपनी धार्मिक विरासत को संजोए हुए है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि श्रृंगी ऋषि का उल्लेख रामायण में मिलता है। कहा जाता है कि उन्होंने अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध पुत्रकामेष्टि (अश्वमेध परंपरा से जुड़ा) यज्ञ संपन्न कराया था, जिसके फलस्वरूप भगवान श्रीराम सहित चारों राजकुमारों का जन्म हुआ। उनके मस्तक पर श्रृंग (सींग) के समान उभार होने के कारण उनका नाम श्रृंगी ऋषि पड़ा।
ग्रामीणों की मान्यता है कि महर्षि श्रृंगी ऋषि ने गांव संघौर में कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम संघौर पड़ा। गांव में स्थित उनकी पावन समाधि आज भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है, जहां ग्रामीण नगर खेड़े के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं। समाधि के समीप बनी पादुकाओं की भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार समाधि के पूर्व दिशा में बहने वाली सरस्वती नदी तपस्या के समय महर्षि श्रृंगी ऋषि के चरणों का स्पर्श करते हुए प्रवाहित होती थी। यही मान्यता इस स्थल की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाती है।
आज भी संघौर गांव में महर्षि श्रृंगी ऋषि की स्मृतियां, आस्था और लोकविश्वास जीवंत हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और सनातन परंपराओं का भी एक अनमोल प्रतीक माना जाता है।
(रवि कुमार बाबैन जागरण पत्रकार कुरुक्षेत्र सहयोग से प्राप्त जानकारी)













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