महर्षि विभांडक (विभाण्डक) का ऐतिहासिक और पौराणिक आश्रम महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (अहमदनगर) जिले में कोपरगांव के पास संवत्सर (Samvatsar) गाँव में स्थित है。 यह स्थान रामायण काल के महान संत महर्षि विभांडक और उनके पुत्र ऋष्यशृंग (ऋंगी ऋषि) की तपोभूमि माना जाता है。महत्वपूर्ण जानकारियां:पौराणिक महत्व: वाल्मीकि रामायण के अनुसार, महर्षि विभांडक के पुत्र ऋष्यशृंग ऋषि ही थे, जिन्होंने अयोध्या के राजा दशरथ के लिए ‘पुत्रकामेष्टि यज्ञ’ करवाया था。 इसी यज्ञ के फलस्वरूप भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था。स्थान: यह आश्रम संवत्सर (संवत्सर-कोकमठाण क्षेत्र) में स्थित है जो कोपरगांव शहर से लगभग १०-१२ किलोमीटर की दूरी पर है।समीपस्थ आकर्षण: कोपरगांव क्षेत्र में गोदावरी नदी का किनारा और विभिन्न प्राचीन धार्मिक स्थल मौजूद हैं。
कोपरगांव : संवत्सर के पौराणिक शृंगेश्वर मंदिर
कोपरगांव (अहमदनगर) : दक्षिण काशी कही जाने वाली पवित्र गंगा गोदावरी नदी का तट कोपरगांव शहर और तालुका को प्राप्त हुआ है। श्रीक्षेत्र संवत्सर में विभांडक ऋषि के चिरंजीवी पुत्र शृंगऋषि का प्राचीन मंदिर स्थित है। श्रावण मास में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। नागपुर-मुंबई समृद्धि महामार्ग बनने के बाद संवत्सर और कोकमठाण गांवों का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व और बढ़ गया है। भारत के पवित्र ग्रंथ श्रीराम विजय कथासार के पृष्ठ 38 से 41 तथा कथा कल्पतरु ग्रंथ में विभांडक ऋषि और उनके पुत्र शृंगेश्वर का पौराणिक उल्लेख मिलता है।
कथा के अनुसार, नारद मुनि ने भगवान श्रीकृष्ण की 16 हजार रानियों को देखकर स्वयं स्त्री बनने की इच्छा व्यक्त की। भगवान श्रीकृष्ण ने “तथास्तु” कहा और जब नारद ने नदी में स्नान किया तो वे “नारदी” नामक स्त्री में परिवर्तित हो गए। कालांतर में उन्हें 59 पुत्र और एक पुत्री कपिला हुई। बाद में युद्ध में उनके 59 पुत्र मारे गए। यह कथा द्वापर युग की मानी जाती है।
कश्यप ऋषि के पुत्र विभांडक और उनके पुत्र शृंगेश्वर कठोर तपस्या कर रहे थे। तपस्या के दौरान उनके सिर पर सींग निकल आए, इसलिए उनका नाम शृंगऋषि पड़ा। शृंगेश्वर मंदिर के पीछे गोदावरी नदी के किनारे आज भी नारद के पुत्रों की 59 समाधियां मौजूद हैं।
एक बार शृंगेश्वर मंदिर में इंद्र की सभा लगी थी, जिसमें अनेक ऋषि-मुनि उपस्थित थे। इंद्र ने वरुण देव से वर्षा रोकने का आग्रह किया। तब ऋषियों ने कहा कि जब शृंगेश्वर आश्रम में ऋषियों को भोजन कराया जाएगा तभी वर्षा होगी। तभी से आज तक संवत्सर में यह परंपरा जारी है।
कहा जाता है कि राजा रोमचरण के राज्य में 12 वर्षों तक अकाल पड़ा था। तब विद्वानों ने बताया कि यदि शृंगऋषि को लाया जाए तो संकट दूर हो सकता है। संवत्सर क्षेत्र पहले दंडकारण्य का हिस्सा था। भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास का कुछ समय यहां बिताया था।
अयोध्या के राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए शृंगऋषि के हाथों पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी गई थी। उसी यज्ञ के बाद उन्हें पुत्र प्राप्त हुए। इस यज्ञ को देखने के लिए वामदेव, जबाली, वसिष्ठ, कश्यप, कण्व, पाराशर, नारद आदि अनेक ऋषि उपस्थित थे। इन सभी संदर्भों का उल्लेख तत्कालीन संपादक दामोदर सावळरामा यंदे द्वारा प्रकाशित कथा कल्पतरु ग्रंथ में मिलता है।
कोपरगांव से लगभग 10 किलोमीटर दूर संवत्सर गांव स्थित है। नागपुर-मुंबई एक्सप्रेसवे गुजरने के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1989 में ब्रह्मलीन संत रामदासी बाबा, राष्ट्रसंत जनार्दन स्वामी और आत्मा मालिक (जंगलीदास माऊली) के मार्गदर्शन में किया गया था। गोदावरी नदी के किनारे स्थित यह स्थान अत्यंत मनोहारी है। श्रावण मास में यहां दर्शन और अभिषेक के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। संत मीराबाई मिरीकर को भी इसी आश्रम में आध्यात्मिक साक्षात्कार प्राप्त हुआ था।














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